Eid Al-Adha : जानिए क्‍यों मनाई जाती है ईद-उल-अजहा, इस से जुड़ी खास बातें, क्यों दी जाती है कुर्बानी ?

रोचक तथ्य

ईद-उल-अजहा इस साल देशभर में 1 अगस्त (यानि आज) मनाई जा रही है. इस्लामिंक कैलेंडर के 12वें महीने की 10 तारीख को ईद-उल-अजहा मनाई जाती है, पूरी दुनिया के मुसलमान इस महीने में पवित्र मक्का सऊदी अरब में एकत्रित होकर हज करते हैं, ईद उल अजहा भी इसी दिन मनाई जाती है ईद-उल-अजहा, रमजान के महीने के खत्म होने के 2 माह बाद मनाई जाती है. आप को बता दें, ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी दी जाती है और मीठी ईद के बाद यह इस्लाम धर्म का प्रमुख त्योहार होता है.

आइए जानते हैं मुसलमान क्‍यों और कैसे मनाते हैं ईद-उल-अजहा का त्‍योहार

1- ईद-उल-अजहा का महत्व

ईद-उल-अजहा का दिन फर्ज-ए-कुर्बानी का दिन होता है, इस्लाम में मुस्लिमों और गरीबों का खास ध्यान रखने की परंपरा है. इस वजह से ईद-उल-अजहा पर गरीबों का विशेष ध्यान रखा जाता है, इस दिन कुर्बानी के बाद गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं. इन तीन हिस्सों में खुद के लिए एक हिस्सा रखा जाता है, एक हिस्सा पड़ोसियों और रिश्तेदारों को बांटा जाता है और एक हिस्सा गरीब और जरूरतमंदों को बांट दिया जाता है. इसके जरिए मुस्लिम लोग पैगाम देते हैं कि वो अपने दिल की करीब चीज भी दूसरों की बेहतरी के लिए अल्लाह की राह में कुर्बान कर देते हैं.
ईद-उल-अजहा के लिए मुसलमान अपने-अपने घरो में लाड़-प्‍यार से पल रहे बकरे, ऊँट व भैस की कुर्बानी देते हैं, जिन लोगों के घर में कुर्बान के लिए कोई जानवर नहीं होता है वे ईद से कुछ दिन पहले बाजार से किसी भी जानवर (बकरे, ऊँट व भैस) खरीदकर उसे घर ले आते हैं और फिर बकरीद के दिन उसकी कुर्बानी देते हैं.

2- क्यों मनाते हैं ईद-उल-अजहा

ईद-उल-अजहा को कुर्बानी के जज्‍बात को सलाम करने के महापर्व के रूप में मनाया जाता है, अल्‍लाह की राह में पैगंबर मोहम्‍मद के पूर्वज हजरत इब्राहिम द्वारा दी गई कुर्बानी को याद करने के उपलक्ष्‍य में ईद-उल-अजहा मनाई जाती है, इस्लामिक मान्यता के आनुसार हजरत इब्राहिम की इबादत से खुश होकर खुदा ने उनकी दुआओं को कुबूल किया और उसके बाद अल्लाह ने उनकी परीक्षा ली, इस परीक्षा में अल्लाह ने हजरत इब्राहिम से उनकी सबसे कीमती और प्यारी चीज की बली देने की मांग की.
ईद-उल-अजहा के मौके पर सऊदी अरब में स्थित मुसलमानों के पवित्र धार्मिक स्‍थल मक्‍का में शैतान को पत्‍थर मारने की परंपरा निभाई जाती है, इस्लामिक मान्यता के आनुसार जब हजरत इब्राहिम खुदा के लिए अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए जा रहे थे तो, तो उन्हें शैतान ने अपनी राह से डिगाने की कोशिश की थी, इसलिए हजयात्रा के अंतिम दिन शैतान को पत्‍थर मारने की परंपरा है.
हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे हजरत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा की राह में कुर्बान किया था. तब खुदा ने उनके जज्बे को देखकर उनके बेटे को जीवन दान दिया था. इस पर्व को हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में ही मनाया जाता है. इसके बाद अल्लाह के हुक्म के साथ इंसानों की जगह जानवरों की कुर्बानी देने का इस्लामिक कानून शुरू किया गया.

3- क्यों देते हैं कुर्बानी?

ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी वही लोग दे सकते हैं जिनके पास 52 तोला चांदी हो या इतने ही मूल्य का पैसा उनके पास हो, जिन लोगों के पास पहले से कर्ज है तो उसके लिए कुर्बानी जरूरी नहीं है, ऐसे जानवर की कुर्बानी नहीं दी जाती जिसको शारीरिक रूप से बीमारी है या शरीर का कोई हिस्सा ठीक नहीं है.
हजरत इब्राहिम ने जब कुर्बानी दी थी तो उन्हें लगा कि उनकी भावनाएं बीच में आ सकती हैं और इस वजह से उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध कर कुर्बानी दी थी. इसके बाद जब उन्होंने अपनी आंखों से पट्टी हटाई तो उनका पुत्र उनके सामने जीवित खड़ा था. बेदी पर कटा हुआ दुम्बा (सउदी में पाया जाने वाला भेड़ जैसा जानवर) पड़ा था. इसी वजह से ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी देने की शुरुआत हुई.यह आर्टिकल है

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