मेरे बच्चों से मुकाबला करोगे ?

हिंदी साहित्य

भला मेरी मोंटू क्यों साड़ी बदल कर आए । साड़ी बदलनी है तो मीनू को बोलो भाभी ? शायद पहली बार सबके सामने शांत सीमा बोले ही जा रही थी । दोनों भाई भी हैरान थे और दूसरी तरफ चले गए थे । पिता का साया तो सीमा के सर से बचपन में ही उठ गया था । दोनों बड़े भाइयों ने उसका पिता के समान पालन किया था । दोनों भाभियों के आने के बाद सीमा की स्थिति भी दयनीय होती गई , क्योंकि मां की तबीयत भी अक्सर खराब ही रहती थी तो सारे घर का काम सीमा पर ही आ पड़ा । कुछ समय बाद जब सीमा का विवाह हुआ तो वहां भी अपनी 4 ननदों की शादी का भार और घर का काम उसे ही संभालना था । 4 ननदों की शादी करने के लिए सीमा के ससुर को अपना खेत भी बेचना ही पड़ा और अंततः उसके ससुर की मृत्यु के बाद वह शहर में अपने मायके में आ बसी । घर में मां की भी तबीयत खराब ही थी अंततः मां की रोवा , भाभियों के घर के काम और अपने दोनों बच्चों को वह बहुत मन से संभालती थी । मां के कहने से उसकी भाभियों ने भी अपने इतने बड़े घर के पीछे दो कमरे लायक थोड़ी जगह दे दी थी । दोनों भाइयों की वर्कशॉप में ही उसके पति को भी काम मिल गया था । और इस तरह से अपनी बेटी मोंटू और बेटे ललित कापालन पोषण कर रही थी

मृत्यु से पहले जिद करके सीमा की माने भाइयों को कहकर वह दो कमरों की जगह सीमा के ही नाम करवा दी थी । सीमा और उसका पति सारे दिन भाभियों और उनके बच्चों का ही काम करते रहते थे एवज में भाभी भी सीमा को तानों के साथ साथ अपने बच्चों के कपड़े इत्यादि भी देती ही रहती थी । समय बीता जहां भाभियों के बच्चे अच्छे पढ़ लिख रहे थे वही सीमा की बेटी भी बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण कर चुकी थी और नजदीक के छोटे से प्ले स्कूल में वह पढ़ाने भी लगी थी । एक बार अपनी साथी मास्टरनी की शादी में रह गई तो वहां उसे दूल्हे के दोस्त शेखर ने देखा और सीमा के सामने मोंटू से शादी का प्रस्ताव रखा । शेखर के माता पिता इस दुनिया में नहीं थे वह अपनी मोसी और नानी के साथ ही रहता था । कामचोर तो मोंटू भी नहीं थी । शादी के बाद भी उसने भी अपनी नानी और मोसी सारा का दिल जीत लिया और जो मोटरसाइकिल उसके उसके दहेज में दी गई थी वह उसने अपने भाई को ही दे दी क्योंकि शेखर के पास पहले से ही एक मोटरसाइकिल थी । शेखर दुकानों में सामान सप्लाई का काम करता था उन्हीं में से एक दुकान में उसने सीमा के भाई की भी नौकरी लगवा दी थी । हालांकि सीमा भाभियों के काम अभी भी कर लेती थी लेकिन अब उसके दिन बदल चुके थे घर के पिछवाड़े में ही एक मंजिल और बनाकर सीमा ने नीचे एक छोटी सी दुकान भी खोल दी थी जिसमें कि अक्सर उसका पति और वह बैठा करते थे

सीमा का स्वतंत्र होना उसकी भाभियों को बेहद अखर रहा था , हालांकि भाइयों ने कभी कुछ नहीं कहा और उनका व्यवहार अभी सीमा के प्रति वैसा ही था । लेकिन भाभी और भाभियों की बहू का व्यवहार सीमा के प्रति अब वैसा ना रहा । सीमा का सर उठा कर जीना उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगता था । धीरे – धीरे उन दोनों में औपचारिकता का ही व्यवहार रह गया था और आब सीमा अपने घर के कामों में लगी रहती थी । अब जब भाभी के सबसे छोटे बेटे की शादी थी सीमा ने सारे घर का काम संभाला ही हुआ था । शादी में घुड़चढ़ी के समय ही सीमा की बेटी मोंटू भी आई थी । आते हुए मोंटू को उसकी सांसों ने बहुत सारे गहने पहना कर भेजा था जिनमें की शेखर की मृत मां के गहने भी शामिल थे । मोंटू बहुत भारी साड़ी पहन कर आई थी । तैयार होकर जब भाभी की बड़ी बेटी मीनू यानी कि दूल्हे की बहन भी आई तो उसके गहने मोंटू के सामने बहुत फीके थे । साड़ियां तो दोनों की एक जैसी ही थी । यह देख कर भाभी की बेटी बिफर गई । दूसरे कमरे में बड़ी भाभी भुनभुना रही थी कि अब सीमा हमारे बच्चों से मुकाबला करेगी । अंतत : दोनों भाभियों ने मिलकर सीमा को अपना फैसला सुनाया कि मोंटू को कहे कि साड़ी बदलले शादी में दोनों लड़कियों की एक जैसी साड़ी अच्छी नहीं लगती । आज शायद पहली बार सब ने सीमा की आवाज सुनी वह भी बराबर चिल्लाकर कह रही थी कि मेरी मोंटू क्यों कर साड़ी बदले अपनी मीनू की बदलवालों । आज सीमा की ऊंची आवाज सब को यह एहसास करवा रही थी कि समय कभी एक सा नहीं रहता । मेहनत अपना रंग लाती है । आज सीमा बोल रही थी और सब सुन रहे थे । ब्लॉग पढ़ने के लिए धन्यवाद यदि पसंद आए तो लाइक फोलो और शेयर करना ना भूले ।

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