बलात्कार को कैसे रोके ( How to stop rape)

शिक्षा सोशल

देश और दुनियाँ से बलात्कार रेप जैसी घिनौनी वारदात जो समाज के लिए अभिशाप से कम नहीं हम जितना ही इन्हे रोकने का प्रयास कर रहे है या कोशिश करते है उससे कई गुना ज्यादा तेजी से बढ़ रहीं है ये घटनाएं, तो अब सवाल ये उठता है की इन घटनाओ को कैसे रोका जा सके.

इस सवाल का जवाब है सीधा सा जवाब है हाँ इन घटनाओ को रोका जा सकता लेकिन इसके लिए आपको कुछ अपना योगदान देना पड़ेगा अगर आप तैयार है तो ही ये पोस्ट आपके लिए है अन्यथा व्यर्थ में आपका टाइम बर्बाद होगा इसमें ?

जवाब थोड़ा लंबा है, लेकिन सटीक है ,क्योंकि समाज का नज़रिया खस्ताहाल है, और समस्या बहुत उलझी हुई है। इसे दस सवालों पर दस छोटे जवाबों के रूप में भी लिख सकता था, लेकिन चाहता हूँ कि संपूर्ण उत्तर एक जगह हो। जब आपके पास वक़्त हो पढ़ने और सोचने-समझने का, तब इत्मीनान से पढ़िए, लेकिन पढ़िए जरूर।

और जवाब अच्छा लगे तो आप अपनों को सोशल मीडिया पे जहाँ तक हो सके शेयर करिये ताकि एक बिगड़े हुए समाज को आईना दिखा सके और बलात्कार जैसी घटनाओं को हम अपने समाज से पूरी तरह खत्म कर सकें।

इस जवाब में सरकार, पुलिस और न्यायालय की अधिक बात नहीं करूँगा। बस यही कहूँगा कि –

ज़ाहिर तौर पर सरकार को तो कदम उठाने ही चाहिए।

सब जगह स्ट्रीट लाइट होनी चाहिए।

रातभर कुछ तो बसें या मैट्रो चलनी चाहिए, जिनमें कोई सुरक्षाकर्मी मौजूद हो।

पुलिस थाने में ऐसा माहौल सुनिश्चित हो, कि किसी लड़की को रात में वहाँ शरण लेने में डर ना लगे। पुलिस वैन को बुलाने में डर ना लगे। पुलिस लड़की से यह ना पूछे कि इतनी रात को बाहर क्या कर रही थी।

फ़ोन पर इमरजेंसी बटन आदि सुविधाओं को अधिक प्रसारित करना चाहिए।

पुलिस अत्यधिक मुस्तैद होनी चाहिए यौन हिंसा को रोकने के लिए, और ऐसी किसी दुखद घटना की शीघ्रतम छानबीन करने के लिए।

न्यायालय को भी ऐसे मुकदमों को प्राथमिकता पर सुनना चाहिए, और जल्द से जल्द मुजरिमों को कठोर सजा देनी चाहिए। ।

अब बात आती हैं जनता के बारे में। आम लोग केवल ऐसी कोई घटना होने पर
यौन हिंसा का शिकार हुई लड़की के लिए सहानुभूति दिखाकर,
मोमबत्ती जलाकर,
अपराधियों को कड़ी सजा देने की माँग कर, और
सख्त कानूनों की माँग कर
अपनी फ़र्ज़-अदायगी कर लेते हैं।

लेकिन मेरा मानना है ,मैं यह नहीं कहता कि इसमें कुछ गलत है। यह भी जरूर करें, लेकिन यह किसी भी तरह से इस समस्या से निपटने के लिए काफी नहीं है। अगले दिन फिर से कहीं बलात्कार हो जाता है। आप जानते ही हैं कि समस्या दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है।

बलात्कार के कारणों को पहचानने और जड़ से मिटाने के लिए कुछ भी प्रयास होता हुआ मुझे दिख नहीं रहा। बातें हो रही हैं, आलोचना हो रही है, रोष प्रकट हो रहा है, लेकिन कहीं भी कोई भी ज़मीनी प्रयास दिख नहीं रहा, और यह बात मुझे बहुत व्यथित करती है।

अगर वाकई आप इस समस्या को लेकर संवेदनशील हैं, तो मेरे अनुरोध पर आज से अपने व्यक्तिगत स्तर पर आपको कुछ बातें अमल में लानी होंगी। इससे समाज में बलात्कार को रोकने में आपका थोड़ा सा योगदान तो होगा ही, लेकिन यक़ीन मानिए कि उसके साथ ही कुछ समय बाद आप अपने जीवन को बहुत बेहतर पाएँगे।

  1. आज से माँ-बहन की गाली देना बंद कर दें।

शायद आपमें से कुछ अभी से सोच रहे होंगे कि यह तो मैंने बहुत बड़ा अनुरोध कर दिया।

आप यह भी सोच रहे होंगे कि इसका यौन हिंसा से क्या संबंध है। लेकिन बहुत सीधा और गहरा संबंध है, जिस पर शायद किसी और जवाब में विस्तार से लिखूँगा यदि आपने कमेंट में लिखा तो। संक्षेप में कहूँ तो जब आप कहते हैं कि मैंने तो उसकी माँ ** दी, तो आपने कहा है, कि आपने बलात्कार कर दिया। अब आप कहेंगे कि ऐसे ही बोल देते हैं, इसको इतना शाब्दिक रूप से क्यों लेना। लेकिन गंभीर होने की जरुरत है। आप बलात्कार को नॉर्मलाइज़ कर रहे हैं।
जरा जो शब्द आपने बोला है उसको थोड़ा सा गहराई से सोचकर देखिये बताइये।

वैसे तो कभी भी ऐसी गाली देना सही नहीं है, लेकिन आप इतना तो मानेंगे कि कुछ और नहीं, तो केवल गुस्से और लड़ाई तक ही इन्हें सीमित करें। कम से कम इसे यूट्यूब फेसबुक या अन्य कोई सोशल मीडिया पर कमेंट करते हुए और दोस्तों के साथ हँसी-मज़ाक की आम बातचीत में तो बंद कर दें।

ज़रा सोचिए कि क्या वाकई आपको विस्मयादि-बोधक शब्दों के लिए

“अबे बहन“, “हट मादर“,
“तूने तो आज मूड की माँ ** दी”,
“उसकी तो मैंने अच्छे से ** मार ली”
कहने की जरुरत है?

क्या वाकई इन शब्दों के बिना आपकी बात में वज़न या मज़ा नहीं आएगा? क्या वाकई गालियाँ देकर बातें करना बहुत कूल, यानि मस्तीपूर्ण होता है?

आप इनकी जगह इन शब्दों का प्रयोग भी तो कर सकते हो कर के देखो एक बार अच्छा लगेगा।

‘अबे जा हरामखोर’,
‘बेवकूफ आदमी’,
‘पाजी’, ‘शातिर’
‘वाट लगा दी’,
‘ऐसी-तैसी कर दी’
भी तो कह सकते हैं।

वैसे आप हर तरह की गाली देना ही क्यों बंद नहीं कर देते? क्या वाकई यह इतनी पक्की आदत बन चुकी है, कि गालियाँ दिए बिना आपका काम नहीं चलेगा? क्या आप माँ-बाप और बच्चों के सामने और दफ्तर में भी इस तरह गालियाँ देकर बातें करते हैं?

ऐसा नहीं कि आपके ये सब गालियाँ देना बंद कर देने से बाकी लोग भी तभी बंद कर देंगे। लेकिन जैसा महत्मा बुद्ध ने कहा है कि जब वे आपको गाली दें, तो आप गाली ना लें। गाली को उनके पास ही छोड़ दें।

अगर वे ऐसे ही हवा में गालियाँ दे रहे हों, तो विनम्रता से कह दीजिए कि क्या बात-बात में माँ-बहन की गालियाँ निकालता है यार। बिना गालियों के बात नहीं कर सकता क्या? वे आपका मज़ाक उड़ाएँगे कि क्या बच्चों की तरह कर रहा है। लड़के तो आपस में गालियाँ देते ही हैं। अब तो बहुत सी लड़कियाँ भी माँ-बहन की गालियों का इस्तेमाल कर खुद को आधुनिक समझने लगी हैं। बेवकूफी भरे इंटरनेट मीम आ रहे हैं कि जो आपस में गालियाँ देकर बात करते हैं, वे सबसे अच्छे दोस्त होते हैं।

इसलिए आपके गालियाँ देने से मना करने पर दोस्त आपको “सामाजिक क्रांतिकारी”, “ज़्यादा सीरियस”, “बच्चों जैसा” कहकर आपका मखौल करेंगे मज़ाक उड़ाएंगे । लेकिन आप ध्यान रखें कि भले ही वे सब मिलकर आपका मज़ाक उड़ा रहे हैं, लेकिन फिर भी आप सही हैं और वे गलत।

  1. “क्राइम पैट्रोल”,”सावधान इंडिया” और “भाभी जी घर पर हैं” जैसे कार्यक्रम देखना आज से बंद कर दें।

सबसे ज़्यादा अश्लील मनोरंजन इस तरह के कार्यक्रम हैं। कोई और आपको इन्हें देखने की सिफारिश करे, तो साफ़ कहिए कि आप ऐसा घटियापन देखना पसंद नहीं करते हैं।

  1. घटिया फिल्मों का बहिष्कार कर उन्हें सुपरफ्लॉप करवा दीजिए।

हमारा सेंसर बोर्ड पता नहीं कैसे काम करता है। उसके सुधरने की कोई संभावना भी नहीं है। “इंडिया’ज़ डॉटर (भारत की बेटी)”, “उड़ता पंजाब”, “बैंडिट क्वीन” जैसी सामाजिक मुद्दों पर बनी संवेदनशील फिल्मों पर हमेशा गाज गिरती है, और “ग्रांड मस्ती”, “क्या सुपरकूल हैं हम”, “राजा रंगीला” जैसी विकृत फिल्में आसानी से थोड़े-बहुत कट के बाद पास हो जाती हैं।

लेकिन हम खुद का तो दिमाग लगा सकते हैं ना, कि ऐसी फिल्मों का ट्रेलर देखते ही इन्हें नहीं देखने का विचार बना लें। लेकिन हो रहा है इसका विपरीत ही। लोग इनके पोस्टर और ट्रेलर देखते ही दोस्तों के साथ इन फिल्मों को देखने का प्लान बना लेते हैं। नतीजतन ये फिल्में इतनी सफल हो रही हैं, कि इनके सीक्वल बन रहे हैं।

“राजा रंगीला” उसी पहलाज निहलानी ने बनाई है, जिसने सेंसर बोर्ड का प्रमुख होते हुए “उड़ता पंजाब” में 80 कट लगाने के लिए कहा था। इसकी फिल्म में गोविंदा एक लड़की का बलात्कार करता है, और फिर कहता है कि “तू मुझे स्वादिष्ट खाना खिला चुकी है”।

पहलाज निहलानी की बेशर्मी देखिए कि वह इस पर अड़ भी गया कि जब फिल्मों में “फ**” शब्द के प्रयोग की अनुमति हो सकती है, तो इस डॉयलॉग में ऐसा क्या गलत है।
अक्षय कुमार ने “कम्बख्त इश्क़” फिल्म में कहा कि “शादी से पहले लड़कियाँ सैक्स ऑब्जेक्ट होती हैं, और शादी के बाद सैक्स से ऑब्जेक्ट करती हैं।” इसी फिल्म में एक दूसरा डायलॉग यह भी है कि “तुम लड़कियाँ केवल एक काम के लिए अच्छी हो”।
ग्रैंड मस्ती में डायलॉग है कि “बलात्कार से याद आया, मेरी बीवी कहाँ है”

सलमान खान ने दबंग में कहा कि “कमीनी से याद आया तिवारी जी, भाभी जी कैसी हैं?”
अगर आपको ये फिल्में अच्छी लगती हैं, तो वाकई आपको अपना ज़ायका सुधारने की सख्त जरुरत है। देखने के लिए अच्छी फिल्में भी बहुत हैं, तो फिर, ऐसे कूड़े में घटिया मज़ा क्यों लेना।

दंगल, राज़ी, तुम्बड़, गली बॉय, मसान, बाला, सैराट, अंग्रेज, बधाई हो, क्वीन, नीरजा, इंग्लिश विंग्लिश, हिंदी मीडियम, खोसला का घोसला, चक दे इंडिया, बजरंगी भाईजान, अक्टूबर, मक़बूल जैसी जाने कितनी सारी अच्छी फिल्में हैं वो भी देख सकते हैं।

  1. यूट्यूब पर फैल रही गंदगी को देखना बंद करें।

भारत का सबसे लोकप्रिय यूटूबर है “भुवन बैम”। फूहड़पन और गालियों के अलावा क्या है उसमें ऐसा?
“कैरी मिनाती” भी दूसरे लोगों का मज़ाक उड़ाते हुए इतनी ज़्यादा माँ-बहन की गालियाँ देता रहता है, और युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय है।

सैक्स के बारे में खुलकर बातें करने में जिन्हें शर्म आती है, वे लोग ऐसी फूहड़, डबल मीनिंग वाली और औरतों के प्रति हिंसक कॉमेडी देखना बहुत पसंद करते हैं। इस निचले स्तर के प्रोग्राम के करोड़ो में सब्सक्राइबर होना समाज के पतन की ओर इशारा करता है फिर हम कहते है इन घटनाओं में लगाम क्यों नहीं लग रहा है।

इस तरह के और भी सैकड़ों उदाहरण हैं। ज़्यादातर वीडियो तो बकवास ही हैं, जो लोकप्रियता के लिए सृजनात्मकता (क्रिएटिविटी) के बजाए ऐसे शॉर्टकट का इस्तेमाल करते हैं। वे बहाना मारते हैं कि हम क्या करें, जब पब्लिक ही ये सब चाहती है, जबकि सच यह है कि उनमें कल्पनाशीलता का अभाव और जल्दी से लोकप्रिय होने की भूख होती है। अफ़सोस कि इनमें से बहुत से लोगों के लिए ये हथकंडे कारगर भी सिद्ध हो रहे हैं।
यूट्यूब पर वह मत देखिए, जो सब देख रहे हैं, या जो यूट्यूब आपको दिखा रहा है।

बहुत अच्छा मनोरंजन भी आपको यहाँ मिलेगा, और अगर चाहें तो ज्ञानवर्धक कंटेंट भी। बस आपको थोड़ा सा ढूँढने की जरुरत है। प्राइम वीडियो, नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार आदि पर भी काफी अच्छा कंटेंट मौजूद हैं।

  1. बादशाह को नीलाम कर दो। हनी सिंह को कंगाल कर दो।

बादशाह और हनी सिंह के गानों में लड़की को एक उपभोग की वस्तु की तरह दिखाया जाता है। चड्डी पहने हुए बहुत सी लड़कियाँ आसपास मँडराती रहती हैं, और लड़का एक माचो दिखता है।

गाने में डबल मीनिंग के शब्द होते हैं। “आजा बेबी आजा, …. बजा दूँ।” इन शब्दों का छुपा हुआ मतलब समझकर लड़के खुश हो जाते हैं, और बहुत उत्साहित होकर एक-दूसरे को बताते हैं।

“अबे भाई, बादशाह का नया गाना सुना है? पता है तुझे क्या बोला हुआ है उसमें। ये ले, सुन इसे। समझ नहीं आया तुझे? क्या यार, तू तो बिल्कुल ही फुद्दू है। अबे इसका मतलब – “

लड़कों की तो छोड़िए, बहुत सी लड़कियों को भी आजकल इन गानों से कोई ऐतराज़ नहीं होता। वे भी डीजे पर होंठों से गुनगुनाते हुए और पूरे एक्शन के साथ नाचती हैं –

मैं तो तंदूरी मुर्गी हूँ यार, गटका ले मुझे अल्कोहल से। आजा, पटा ले मुझको मिस्ड कॉल से।
दिल्ली की ना बंबई वालों की, पिंकी है पैसे वालों की।
लड़की ब्यूटीफुल, कर गई चुल।
सर्दी लगे तो पीछे लड़की बिठा के देख, कर ले गलती से मिस्टेक।
एक तो हरियाणवी गाना चला था कि “किडनैप हो जावैगी”। सपना चौधरी के इस गाने पर लाइव डांस की तो बात छोड़िए, आम लड़कियाँ भी इतनी ख़ुशी से इस गाने पर डांस करती हैं।
अगर आपका दिमाग इन गानों के बोल सुनकर तरोताज़ा होता है, तो वाकई आपको दिमाग का इलाज करवाने की जरुरत है और आप इन जैसी घटनाओं को बढ़ावा दे रहें हैं।

आपको डांस करना है, तो कीजिए ना। किसने मना किया है। लेकिन ठरकी गानों पर नाचना जरूरी है क्या। आजकल तो बहुत से माँ-बाप अपने बच्चों को ऐसे गानों पर डांस सिखा रहे हैं।

ऐसा गाना चले, तो उतर जाइए डीजे फ्लोर से। अपनी मर्ज़ी का गाना चलवाइए। डांस करने के लिए ये कितने सारे ढंग के गाने भी तो हैं मार्किट में –

सूरज डूबा है यारों,
स्वैग से करेंगे सब स्वागत,
डिस्को दीवाने,
मैं तेरी नचाई नाचूँ सूँ
लंदन ठुमकदा
बण जा तू मेरी रानी, तैनू महल पवा दूँगा
नाचेंगे सारी रात सोणियो वे
दिलबर दिलबर
नशे सी चढ़ गई होए
गल्ला गूड़ीयाँ
और अगर आप थोड़े से अलग “ओ हमदम सुणियो रे”, “रमता जोगी” या “अम्बरसरिया” जैसे गानों पर डांस करेंगे या करेंगी, तब तो आप यक़ीनन महफ़िल की शान बन जाएँगे।
और भी बहुत से ऐसे गाने है जिनपर आप डांस कर सकते है.

अगर आपको कामुक गाने देखने-सुनने का मन है, तो “आज रपट जाएँ तो हमें ना उठइयो” जैसा गाना सुनिए। ज़रा समझने की कोशिश कीजिए कि ऐसे कामुक गाने में भी कुछ गलत क्यों नहीं है, और बादशाह के गाने में क्या गलत है।

रोमांटिक गाने तो नए-पुराने हज़ारों गाने हैं ही। जन्म-जन्म-जन्म साथ चलना यूँ ही, मेरी आशिकी तुम ही हो, ओ मेरे दिल के चैन, हो गया है तुझको तो प्यार सजना।

  1. पॉर्न देखना नैतिकता से ज़्यादा एक सेहत-संबंधी मामला बन चुका है।

कामुक तस्वीरों, पत्रिकाओं, कहानियों और मूर्तियों का इतिहास बहुत पुराना है। लेकिन इस सदी में आया हुआ वीडियो पॉर्न एक काफी अलग मसला है। इसे व्यक्तिगत नैतिकता पर छोड़ देते हैं कि पॉर्न देखना कितना नैतिक या अनैतिक है।

लेकिन समस्या तब आती है, जब किसी किशोर को सैक्स की पहली जानकारी पॉर्न देखकर मिले। इससे दिमाग में बहुत सी खतरनाक भ्रांतियाँ बनती हैं।
यह भी अब अनेकों बार सिद्ध किया जा चुका है कि पॉर्न की वजह से किशोर हीन भावना का शिकार बनते हैं।
किसी ड्रग की तरह पॉर्न को भी ऐसी चीज़ पाया गया है, जिसकी लत लगना संभव है।
आम धारणा के विपरीत पॉर्न देखना सैक्स की शक्ति को बढ़ाने के बजाए लोगों में सैक्स-शक्ति संबंधी समस्या उत्पन्न करता है। हार्डकोर पॉर्न देखने वालों के साथ यह समस्या कहीं अधिक पायी गई है।
पॉर्न एक्टर कंडोम का इस्तेमाल नहीं करते हैं, लेकिन पहले उनकी डॉक्टर द्वारा जाँच होती है कि कहीं उन दोनों में से किसी को कोई सैक्स-संबंधी बीमारी तो नहीं है। लेकिन पॉर्न देखने वाले इस बात को नहीं समझते, और उनके मन में कंडोम के इस्तेमाल को लेकर अवरुद्ध उत्पन्न होते हैं।
इसलिए मेरे विचार में सरकार द्वारा पॉर्न वेबसाइटस को बंद कर अनियंत्रित पॉर्न पर रोक लगाना एक अच्छा कदम था। बहुत से लोग अब भी प्रॉक्सी सेटिंग जैसा कुछ कर पॉर्न देख लेते हैं, लेकिन फिर भी सरकार के कदम से पॉर्न देखने में कमी आई है।

  1. मानसिकता विकृतता के प्रति विरोध दर्ज कीजिए, बजाए कि हामी भरने के।

बड़े शर्म की बात है की जब बलात्कार जैसी घिनौनी घटना हमारे समाज में होती है तब हम उस घटना का लाइव वीडियो पोर्न वेबसाइट पर ढूढ़ने लगते हैं बड़े शर्म की बात है. ऐसा ही कुछ प्रियंका रेड्डी के केस में देखने को मिला , यानी ये लोग बलात्कार की वीडियो देखना चाहते हैं। कई अखबारों में ऐसी भी रिपोर्ट छपी हैं कि लोग बच्चों के साथ दुष्कर्म की पॉर्न, या जानवरों के साथ यौन हिंसा की पॉर्न देखते हैं, और इनका भी एक बाज़ार है।अब यह नैतिकता का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह मानसिक बीमारी का परिचायक है।

80 लाख बार उस वीडियो को ढूँढा गया। कौन हैं ये लोग? ये अलग से किसी एक जगह पर रहने वाले लोग नहीं हैं। इनमें से कुछ लोग आपके आसपास भी होंगे ही। हो सकता है कि उनमें से किसी ने आपके आगे ऐसी कोई वीडियो देखने या ढूँढने का ज़िक्र भी किया हो।

आजकल होटल के कमरों में गुप्त कैमरे लगे होने की कितनी वारदात सामने आती हैं। हो सकता है कि ऐसा कोई चोरी-छुपे बनाया हुआ सैक्स वीडियो आपको किसी ने दिखाया हो। क्या आपने इसके प्रति घिन्न या विरोध दर्ज किया?
मौत के फोटो और वीडियो तो खुलकर शेयर हो ही रहे हैं। उन्हें आगे भेजने में तो किसी को कोई शर्म है ही नहीं। कभी दिल्ली में किसी कुख्यात बदमाश की लाश का फोटो व्हाट्सप्प पर फैलता है, तो कभी न्यूज़ीलैंड की मस्जिद में हुए वीभत्स क़त्लेआम का वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो जाता है।

एक परिचित व्यक्ति को तो मैंने फ़ोन कर डाँट दिया कि क्यों भेजा इस गैंगस्टर की गोलियों से छलनी लाश का फोटो मेरे पास। क्या करूँ इसका? क्या यह मनोरंजन के लिए है? वे बोले, “नाराज़ क्यों होते हो? मैंने तो ऐसे ही भेज दिया था।” मैंने उनसे पूछा कि ऐसे ही का क्या मतलब है? गुड मॉर्निंग भेजो, चुटकला भेजो, कविता भेजो, पर ये सब मत भेजना।

अब यह मत कहिएगा कि हत्या के वीडियो का बलात्कार से क्या संबंध है। मानसिक विकृतता वही है, जो जुर्म में मर्दानगी का एहसास पाती है। मानसिक विकृतता वही है जो विवेक और अपराध-बोध को ख़त्म कर देती है।
अगर आप में भी यह विकृतता है, तो उसे हटाइए। अगर आप अच्छे व्यक्ति हैं, तो आसपास की विकृतता के सामने हामी भरना बंद कीजिए। विरोध दर्ज कीजिए।

  1. कहीं आप अनजाने में बलात्कार का माहौल तो नहीं बना रहे हैं –

यौन हिंसा की जड़ें समाज की कुंठा में गड़ी हुई हैं। कृपया फर्क करना जानिए कामुकता में और बलात्कार की मानसिकता में। केवल सेंसर बोर्ड को ही नहीं, बल्कि समाज के ज़्यादातर लोगों को इस बारे में ग़लतफहमी है कि अश्लील क्या है।

प्रेम के अश्लील होने वाली बात वाहियात है।
रोमांस अश्लील नहीं है।
सैक्स में कुछ अश्लील नहीं है।
समलैंगिकता अश्लील नहीं है।
शादी से पहले सैक्स करना विभिन्न लोगों के लिए नैतिकता के आधार पर मान्य अथवा अमान्य हो सकता है, लेकिन अश्लील जैसा कुछ नहीं है।
छोटे कपड़े अश्लील नहीं होते।
शादी के बाद अफेयर चलाना किसी के लिए अनैतिक हो सकता है, लेकिन अश्लील नहीं है।
मेडिकल स्टोर से कंडोम खरीदना अश्लील नहीं है।
बलात्कार का माहौल किन बातों से बनता है –

अभी हाल ही की घटना दिल्ली में इंस्टाग्राम ग्रुप की तो सबने सुनी ही होगी। आजकल माहौल तो ऐसा बन गया है की माँ बाप अपने बच्चो का फोन तक चेक नहीं कर सकते है। अरे क्यों नहीं चेक करते हो भाई अपने बच्चो को उस माहौल में ढालो। उनसे बात करो अपनी जिम्मेदारी निभाओ।

नोट: अगर आप सोलह साल से कम उम्र के हैं, तो आगे ना पढ़ें

अश्लील होता है बलात्कार पर चुटकले सुनाना और उन पर हँसना। सैक्स पर चुटकले और बलात्कार पर चुटकले में आप फर्क नहीं कर पाते। बलात्कार के चुटकलों पर आपको घिन्न आने के बजाए हँसी भी आती है। अपने दिमाग को बदलिए कि आपको हँसी ना आए।

फिर चुटकला भेजने या सुनाने वाले को बताइए कि यह मज़ाकिया नहीं था। माफ़ कीजिए लेकिन यह घृणित था।
अश्लील होता है इस बात की शेखी बघारना कि कितनी लड़कियों को बहका कर “पेल” दिया, या “ठोक” दिया। मैं जानता हूँ कि बहुत से पाठकों को ऐसे शब्द सार्वजनिक मंच पर सुनना बहुत नागवार गुज़रेगा। कुछ लोग शायद जवाब को रिपोर्ट करने के लिए भागेंगे। लड़कियों को भी यह अजीब लगेगा। लेकिन कब तक हम सच्चाई से मुँह छुपाते रहेंगे? सच्चाई यही है कि हम एक ऐसे घटिया समाज में जी रहे हैं, जहाँ यह बिल्कुल आम बात है।

ठीक है, मैं आपको नैतिकता का कोई भाषण नहीं देना चाहता हूँ कि प्रेम में हो, तभी सैक्स करो। लेकिन किसी लड़की के साथ सैक्स करने को मैडल की तरह टाँगना तो बंद कर दो। यही कह दो कि हमने सैक्स किया, बजाए कि ऐसे शब्दों से उसे किसी वस्तु की तरह दिखाने के, जिसका तुमने उपभोग किया हो।
अश्लील होता है अपने लिंग की लंबाई का, या अपनी सैक्सुअल क्षमता का प्रचार-प्रसार करते फिरना। इसी को मर्दानगी का परिचायक समझा जाता है, और मर्दानगी को यूँ समझा जाता है जैसे कोई अद्भुत गुण, और औरत होना जैसे शर्म की बात।

मैं जानता हूँ कि आप में से बहुत से लोगों ने ऐसा किया होगा, क्योंकि समाज ने हमें यही सिखाया है। लेकिन कृपया अब ऐसा करना बंद कीजिए। सब लोग सेक्स करते हैं, और इसमें ना ही कुछ शर्मिंदा होने जैसा है, और ना ही कुछ बहुत गर्व करने जैसा। ठीक है अगर आप दोस्तों के बीच अपने सैक्स एपिसोडस पर गप्पें लड़ा रहे हैं, लेकिन इसको ट्रॉफी की तरह तो मत दिखाइए।

अधिक सैक्सुअल कामुकता कभी बलात्कार का कारण नहीं होती। जो आदमी दिमाग से सही होगा, वह कभी भी कितना भी कामुक होने पर बलात्कार नहीं करेगा। इसके लिए किसी वेश्या के पास जाया जा सकता है। फिर से वह हर किसी की व्यक्तिगत नैतिकता का प्रश्न है। या हस्तमैथुन तो कोई भी कर ही सकता है, जो किसी की नैतिकता के हिसाब से अनैतिक नहीं होना चाहिए।

लेकिन बलात्कारी यह नहीं समझते, क्योंकि वे दिमाग से बीमार हैं। इसलिए आपकी बातें आपके लिए तो बस बातें हों, लेकिन बलात्कारी की मानसिक विकृतता के लिए एक माहौल बनाती हैं। समझ रहे हैं आप कि मैं क्या कह रहा हूँ।

जिन लोगों की मैंने ऊपर बात की, वे लोग तो लड़की को झूठा झाँसा, और उसके आधार पर लड़की की झूठी इच्छा (विल) पर सैक्स करने (कानूनन बलात्कार) को लेकर डींग मारते हैं। शायद बीस साल बाद जब लड़की का सैक्स कर लेना उसकी चुनरी में दाग कहलाना बंद हो जाएगा, तब यह कानून निरस्त हो जाएगा।

लेकिन वहीं बहुत से लोग इसको एक कदम आगे ले जाकर लड़की की सहमति ना होने पर निर्मम बलात्कार को लेकर भी डींग मारते हैं। वैसे तो इस पर दुनियाभर में बहुत से मनोवैज्ञानिक लेख छपे हैं,लेकिन आप यह बात वैसे भी समझ ही सकते हैं।

इसलिए आप इस तरह लड़कियों को “ठोकने” और “पेलने” की शेखी बघारकर बलात्कारियों के लिए एक माहौल तैयार कर रहे हैं, जहाँ उनके कृत्य के लिए नफरत और घिन्न नहीं होती। बल्कि जहाँ तारीफ पाने के लिए वे बलात्कार कर सकते हैं।

यह कुछ ऐसा ही है, कि कोई आदमी बहुत रिश्वत लेकर, भ्रष्टाचार कर, लोगों के साथ धोखा-धड़ी कर पैसा कमाए, और लम्बी कार खरीदे, और आप उसकी धोखाधड़ी की आलोचना करने के बजाए उसकी कार की वाहवाही कर उसके कृत्य पर ठप्पा लगाएँ। ऐसी तारीफ से उत्तेजित होकर वह और लम्बी कार लेने के लिए और भी ज़्यादा लोगों की जेब और गले काटे।

  1. क्या आप ऐसा आज़ाद समाज स्वीकारते हैं जहाँ महिलाएँ खुलकर जीती हों, या आप खुद उनको “संस्कृति” का पाठ पढ़ाते हैं –

एक कुंठित समाज, जहाँ औरतें दमित हों, बलात्कार की मानसिकता के पनपने की जगह होता है। औरतों के खुलकर बात करने और हँसने को बता दिया गया है “चरित्रहीन”, और घूँघट के पीछे शर्माने और धीमे बोलने को बता दिया गया है सुशील, सभ्य, भारतीय संस्कृति वाली नारी।

अगर आप भारतीय विरासत की बात करेंगे, तो मैं आपको इतिहास और पौराणिक कथाओं से भी ऐसी अल्हड़ महिलाओं के बहुत उदाहरण दे सकता हूँ। लेकिन मैं ऐसा जरूरी नहीं समझता, क्योंकि किसी बात का सही या गलत होना इस पर निर्भर नहीं करता कि वह हमारी परंपरा अथवा संस्कृति में है या नहीं।

हमें औरत को चबूतरे पर बिठाकर देवी के रूप में पूजने वाला और फिर चारदीवारी में बंद करने वाला समाज नहीं चाहिए। हमें ऐसा समाज चाहिए, जहाँ लड़कियाँ अपने व्यक्तित्व के अनुसार अंतर्मुखी या बिंदास, जैसी भी हों।

सुरक्षा के लिहाज से रात को बाहर ना निकलना किसी लड़की का निर्णय हो सकता है, लेकिन रात को बाहर निकलने को उसकी गलती मत घोषित कीजिए। चंडीगढ़, पणजी और मुंबई जैसे शहर जहाँ रात तक लड़कियाँ बाहर घूमती हैं, औरतों की सुरक्षा के लिहाज से ज़्यादा सुरक्षित पाए गए हैं।
जींस पहनना आधुनिकता नहीं है, लेकिन जींस पहनने की आज़ादी होना आधुनिकता है, और हमें वह आधुनिकता चाहिए।

शराब-सिगरेट पीना आधुनिकता नहीं है। नारी सशक्तिकरण तो बिल्कुल नहीं है। लेकिन जिस तरह आप किसी लड़के को शराब पीते हुए देखकर इसे केवल एक हानिकारक पदार्थ मानते हैं, उसी तरह औरत के लिए भी इसे उसके चरित्रहनन का विषय बनाना बंद कीजिए। उसे घूरना, तिरछी नज़रों से देखना, और चरित्रहीन समझना बंद कीजिए।
अफ़सोस कि आम नागरिकों का तो छोड़िए, हरेक नागरिक को समान रूप से बचाने के लिए बाध्य पुलिस वाले भी इस मानसिकता के शिकार होते हैं।

यह क्यों जरूरी है?

फिर से कहता हूँ कि अधिक सैक्सुअल एनर्जी किसी को बलात्कारी नहीं बनाती। सैकड़ों रिसर्च में बलात्कार के पीछे सबसे मुख्य कारण गुस्सा, मानसिक विकृतता और “अपनी ताकत” दर्ज करना बताया गया है। ऐसा कुंठित समाज, जहाँ औरतें दमित हों, बलात्कारी की ज़हरीली मर्दानगी को अवसर देता है बलात्कार कर ऐसी ताकत महसूस करने का।

जैसे वह अपने आपको शेर समझे सहमी हुई बकरी को दबाकर। लेकिन जहाँ औरतें खुलकर गाने, नाचने, बोलने, खाने-पीने, हँसने के लिए आज़ाद होंगी, वहाँ ऐसी ज़हरीली मर्दानगी पर निरंतर वज्रपात होते रहेंगे। ऐसी ताकत महसूस करने का अवसर नहीं होने पर उसे अपनी मानसिक विकृतता का इलाज करवाना होगा।

बहस – तो फिर शहरों में बलात्कार क्यों? अमेरिका जैसे देश में बलात्कार क्यों?

मैंने इस बिंदु से पहले और बहुत से कारण बताए हैं, जो शहरों में और अमेरिका जैसे देशों पर लागू होते हैं। चारदीवारी से निकालकर औरत को बाजार में खड़ा कर दिया गया है।

कभी आयोजकों द्वारा निर्धारित पुरुष खिलाड़ियों और महिला खिलाड़ियों के कपड़ों में अंतर पर गौर कीजिए।
फिल्मों में औरत को एक आइटम की तरह पेश करने पर गौर कीजिए।

यह आधुनिकता नहीं, बल्कि उसी रूढ़िवादिता का नकाबपोश रूप है, जहाँ व्यक्ति को अपनी माँ, बहन, पत्नी सुशील, सभ्य, संस्कृति वाली अच्छी लगती है, और तवायफ, चक्कर चलाने वाली, फिल्म वाली लड़की बिंदास।

अमेरिका में भी सैक्स करने को लेकर लड़के डींगें मारते फिरते हैं। वहाँ भी पॉर्न, घटिया गानों और वीडियो का जंजाल है।

दूसरी बात यह भी है कि गाँव में हो रहे यौन हिंसा के बहुत से मामले पुलिस तक नहीं पहुँचते हैं, क्योंकि वहाँ पर किसी यौन हिंसा की शिकार लड़की के लिए जीना और भी मुश्किल है। जिस तरह शहर की तुलना में गाँव, इसी तरह अमेरिका की तुलना में भारत में भी ऐसे मामले कम रिपोर्ट होते हैं। इसलिए आप बहुत से विकसित देशों की क्राइम रेट देखेंगे, तो वह आपको कहीं अधिक असुरक्षित देशों से ज़्यादा दिख सकती है। क्योंकि यह आँकड़ा रिपोर्ट किए गए अपराध के आधार पर बनता है।
इसलिए इस बात पर संदेह करना छोड़ दें, कि हमें आज़ाद समाज चाहिए या नहीं। कोई भी गुड़गाँव वाली आंटी हो, मैट्रो वाली ताई हो, या खाप पंचायत का ताऊ, आपके सामने, फेसबुक पर, यूट्यूब पर रूढ़िवादिता फैला रहा हो, या बलात्कार के लिए औरतों के कपड़ों, या उनके बाहर निकलने को जिम्मेवार कह रहा हो, तो उसे नज़रअंदाज़ मत कीजिए। उसे सीधे-साफ़ शब्दों में जवाब दीजिए।

  1. आप अपने बच्चों को क्या शिक्षा दे रहे हैं –

बच्चों के बजाए आपके छोटे भाई-बहन भी हो सकते हैं।

“तू मेरी बेटी नहीं, मेरा बेटा है”, “हट पागल, तू क्या कोई लड़की है। शर्म नहीं आती?” जैसा कुछ कहकर आप अनजाने में लड़की होने पर हीनभावना तो नहीं दर्शा रहे हैं। क्या आप अपने बेटे को लड़कियों को समदृष्टि से देखना सिखा सिखा रहे हैं ना?

भूलकर भी अपने बच्चों को केवल लड़कियों के या केवल लड़कों के स्कूल में दाखिला ना दिलवाएँ। सह-शिक्षा स्कूलों में बच्चे नहीं बिगड़ते, बल्कि ऐसे स्कूलों में उनके दिमाग में असामान्य झिझक और शर्म बनती है। मुझे समझ नहीं आता कि इक्कींसवी सदी में भी इस तरह के स्कूल कैसे चल रहे हैं?
भारतीय स्कूलों में सेक्स एजुकेशन के शुरू होने का इंतज़ार ना करें। बात चलती रहेगी। सब लोग कहेंगे कि हाँ, ऐसा होना चाहिए। लेकिन कोई करेगा नहीं। इसलिए खुद से सुनिश्चित करें कि आपके किशोर बेटे या बेटी को सैक्स संबंधी जानकारी सही सैक्स एजुकेशन से मिले। मतलब कि स्कूल से नहीं तो आप उन्हें सेक्स एजुकेशन दें।

ना ही यह अव्यवहारिक है, और ना ही इतना मुश्किल। आप उन्हें एक नग्न लड़के और लड़की की तस्वीर दिखाइए, और बताइए कि उनके शरीर में यह फर्क होता है। सैक्स किस तरह से किया जाता है।

असल में मुख्य बात सेक्स की प्रक्रिया सिखाने को लेकर नहीं है। यह तो वे खुद बिना सीखे भी पता कर सकते हैं। बात सेक्स के प्रति सही रवैया उत्पन्न करने की है। सेक्स अपराध-बोध की चीज़ नहीं है। यह गर्व करने की, या कानाफूसी करने की चीज़ नहीं है। यह आनंद के लिए है। सैक्स सहमति से किया जाता है। इसमें दूसरे की संतुष्टि का भी ध्यान रखना चाहिए। और सैक्स करना हो, तो यौन कवच, यानि कंडोम का इस्तेमाल करना चाहिए। बस इतनी सी तो बात करनी है।

अगर आप इस वहम या शर्म में जिएँगे कि मेरा बेटा या बेटी कैसे सैक्स कर सकता है, इससे कुछ फायदा होगा नहीं। आप खुद को बेवकूफ बना रहे हैं, और उन्हें खतरे में छोड़ रहे हैं।
अंत में सभी दस बातों को सूचीबद्ध कर देता हूँ, ताकि आप इनका स्क्रीनशॉट या प्रिंट-आउट ले सकें, और इन्हें याद रखना, इन पर अमल करना आपके लिए आसान हो –

  1. गालियाँ देना बंद करें। माँ-बहन की गालियाँ तो बिल्कुल भी ना दें।
  2. क्राइम पैट्रॉल, सावधान इंडिया, भाभी जी घर पर हैं जैसे क्राइम और छिछोरेपन को मनोरंजन के रूप में पेश करने वाले टीवी सीरियल देखना बंद करें
  3. किसी फिल्म को केवल इसलिए देखने ना जाएँ क्योंकि उसमें सैक्स, चुंबन, फूहड़पन, और डबल मीनिंग के चुटकले मिलेंगे। यक़ीन मानिए कि इससे मज़ेदार और बहुत फिल्में होती हैं।
  4. ध्यान से चुनिए कि यूट्यूब पर आप क्या देखते हैं। मज़ाक चलता है, लेकिन मज़ाक में कहीं कुछ हिंसक और विकृत तो नहीं है जो आपके दिमाग को घटिया बना रहा हो। अच्छे कंटेंट को देखिए, और प्रोमोट कीजिए।
  5. औरतों को वस्तु के रूप में दिखाने वाले गानों पर नाचना या गाना बंद कर दीजिए। नाचने के लिए बढ़िया गाने भी बहुत से हैं।
  6. सैक्स की जानकारी पॉर्न से मत लीजिए। पॉर्न ना ही देखें, तो बेहतर है।
  7. हत्या या यौन हिंसा आदि की वीडियो ना देखें, और ना ही आगे भेजें।
  8. सैक्स को मर्दानगी का परिचायक बनाकर सैक्स की डींगें मारना, सैक्स की बात करते हुए लड़कियों को वस्तु के रूप में दिखाना, या बलात्कार के चुटकलों पर हँसना बंद कीजिए।
  9. रूढ़िवादिता का समर्थन करने के बजाए ऐसे आज़ाद समाज की और कदम बढ़ाएँ, जहाँ औरतें खुलकर हँसती-गाती हों।
  10. बच्चों का सह-शिक्षा स्कूलों में दाखिला करवाएँ। युवा होने पर उन्हें सैक्स एजुकेशन दें। लड़कों को लड़कियों को समदृष्टि से देखना सिखाएँ।

पूरे समाज का इन सब बातों को मानना असल में “ज़ीरो टॉलरेंस” होगा, बजाए कि केवल फेसबुक पर काले रंग की प्रोफाइल तस्वीर लगाने के।

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