देश में पहली बार शुरू हुई महंगे मसाले हींग की खेती

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सीएसआईआर की घटक प्रयोगशाला, इंस्टीच्यूट ऑफ़ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी, पालमपुर के प्रयासों के कारण हिमाचल प्रदेश के सुदूर लाहौल घाटी के किसानों के खेती के तरीकों में एक ऐतिहासिक बदलाव आया है. इस बदलाव की वजह से यहां के किसानों ने इस इलाके की ठंडी रेगिस्तानी परिस्थितियों में व्यापक पैमाने पर बंजर पड़ी जमीन का सदुपयोग करने के उद्देश्य से अब असाफोटिडा यानि हींग की खेती को अपनाया है. सीएसआईआर-आईएचबीटी इसके लिए हींग के बीज लाए और इसकी कृषि-तकनीक विकसित की.

हींग प्रमुख मसालों में से एक है और यह भारत में उच्च मूल्य की एक मसाला फसल है. भारत अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान से सालाना लगभग 1200 टन कच्ची हींग आयात करता है और इसके लिए प्रति वर्ष लगभग 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करता है. भारत में फेरुला अस्सा-फोटिडा नाम के पौधों की रोपण सामग्री का अभाव इस फसल की खेती में एक बड़ी अड़चन थी. भारत में असाफोटिडा यानि हींग की खेती की शुरुआत करने के उद्देश्य से, 15 अक्टूबर, 2020 को सीएसआईआर-आईएचबीटी के निदेशक डॉ. संजय कुमार द्वारा लाहौल घाटी के क्वारिंग नाम के गांव में एक किसान के खेत में हींग के पहले पौधे की रोपाई की गई.

चूंकि हींग भारतीय रसोई का एक प्रमुख मसाला है, सीएसआईआर-आईएचबीटी के दल ने देश में इस महत्वपूर्ण फसल की शुरुआत के लिए अथक प्रयास किए. संस्थान ने अक्टूबर, 2018 में आईसीएआर-नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज, नई दिल्ली के माध्यम से ईरान से लाये गये बीजों के 6 गुच्छों का इस्तेमाल शुरू किया. आईसीएआर-एनबीपीजीआर ने इस बात की पुष्टि की कि पिछले 30 साल में देश में असाफोटिडा के बीजों के इस्तेमाल का यह पहला प्रयास था. आईसीएआर-आईएचबीटी ने एनबीपीजीआर की निगरानी में हिमाचल प्रदेश स्थित सीईएचएबी, रिबलिंग, लाहौल और स्पीति में हींग के पौधे उगाए.

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