क्या गांधी जी की हत्या भी एक जेहाद ??

Articles रोचक तथ्य

पिछले कुछ वर्षों में हिंदुओं में कम से कम एक जागरूकता तो अवश्य आई है कि सोशल मीडिया द्वारा गांधी जी पर कांग्रेस व वामपंथियों द्वारा सृजित कृत्रिम ज्ञान प्राप्त कर उत्तेजक टिप्पणी करना अवश्य सीख गए हैं जिसमे मैं भी सहभागी रहा हूँ। परंतु भारतीय जनमानस के मनः मस्तिष्क व राजनीतिक खिलाड़ियों के सियासी खेल में आज भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है कि गांधी जी की हत्या किसको क्या क्या लाभ दे गई ??

गांधी जी की हत्या के कारणों में गोडसे द्वारा देश का बंटवारा व पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपया देना ही अंतिम कारण कहा गया। इस विषय के मूल लिखित बयान के पैरा 129 में लिखा है उसे प्रधानमंत्री नेहरू के दस्तावेज से पता चला कि उन्होंने पाकिस्तान के बकाया 55 करोड़ रुपए, गांधी जी के दबाव में, मुक्त कर दिए।” नेहरू भक्ति में यह झूठ की पराकाष्ठा थी और ऐतिहासिक तथ्य इस झूठ को बेनकाब करते है।

55 करोड़ पर चौकाने वाले तथ्य सार्वजनिक हैं कि प्रधानमंत्री नेहरू और गवर्नर जनरल माउंटबेटन 75 करोड़ की राशि पाकिस्तान को देना तय कर चुके थे। 20 करोड़ रु दिए जा चुके थे एवं 55 करोड़ शेष थे। गोडसे के सभी बयानों में इस 75 करोड़ में 20 करोड़ के भुगतान का बड़ी सफाई से जिक्र तक नहीं किया गया, क्योंकि इससे नेहरू की छवि धूमिल होती थी।

चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि बकाया राशि की दूसरी किश्त 55 करोड़ पाकिस्तान को दिए जाने का जो निर्णय नेहरु जी ने 2 फरवरी 1948 के दस्तावेज में लिया था, जिसके लिए 4 दिन पूर्व ही 30 जनवरी,1948 को गोडसे ने गांधी जी की हत्या कर दी। ऐसा गोडसे के बयान के पैरा नंबर 129 में वर्णित है।

दूसरा सबसे झकझोर देने वाला खुलासा यह है कि न्यायालय में पेश सबूतों के अनुसार कि गांधी जी ने अपने 13 से 18 जनवरी के अनशन में कभी कहीं 55 करोड़ का वर्णन भी नहीं किया। यहाँ तक कि वीर सावरकर ने भी अपने पत्र में गांधी जी के अनशन में उनके गिरते स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की थी परंतु कहीं भी ऐसे किसी 55 करोड़ पर जिद्द की कोई बात न थी।

न्यायालय में सैकड़ों समाचार पत्रों की कटिंग के सबूत पेश किए गए लेकिन एक समाचार पत्र में भी 55 करोड पर अनशन की बात न छपी थी, क्योंकि ऐसी कोई जिद्द थी ही नहीं। गोडसे के बयान के अनुसार महात्मा गांधी ने 21 जनवरी के लगभग 55 करोड़ देने की बात की थी जबकि अनशन तो पहले ही खत्म हो चुका और 21 जनवरी को गोडसे कानपुर रेलवे स्टेशन के गेस्ट हाउस में ठहरा हुआ था जिसके सबूत पेश किए गए थे।

सबसे विशेष बात यह कि 55 करोड़ देने का निर्णय नेहरू जी ने अपने 2 फरवरी, 1948 के आदेश में लिया जो कि किसी समाचार पत्र में भी न छपा।

गोडसे के बयान के अनुसार, संभवतः गांधी जी ने 21 जनवरी के भाषण में ऐसा कहा। परंतु गांधी जी तो अनशन 18 जनवरी को ही समाप्त कर चुके थे तथा 21 जनवरी को गोडसे कानपुर रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में था। यह 55 करोड़ की बात समाचार पत्रों में भी न छपी थी क्योंकि गांधी जी ने ऐसी कोई बात कही ही न थी तो गोडसे ने नेहरू के 2 फरवरी के निर्णय का सपना आने पर 4 दिन पूर्व 30 जनवरी को ही गांधी जी को गोली मार दी थी।

वाह! क्या दिव्य दृष्टि थी गोडसे की ??

शायद 2018 में भाजपा सरकार ने गोडसे के 150 पैरा के लिखित बयान को सार्वजनिक कर दिया है। पढ़ने पर पता चला कि आखिर क्यों नेहरू ने फिर बाद में गांधी परिवार की कांग्रेस ने इसे कई दशक से प्रतिबंधित कर रखा था।

इस लिखित बयान में गोडसे ने न्यायालय के समक्ष दिए अपने बयानों में, नेहरू की नीतियों, सर सैयद अहमद खान, अल्लामा इक़बाल, आगा खान की मुसलमानों को पृथक राष्ट्र मानने व दो- राष्ट्र की मांग के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं कहा। चलिए मान लेते हैं कि मुकदमा गांधी जी की हत्या का था तो अन्य विषयों की चर्चा क्यों हुई बयानों में ये सवाल खड़ा होता है। आखिर क्यों गोडसे अपने इतने विस्तृत बयानों में, नेहरू के विवादित निर्णयों पर मौन रहे, जबकि वह पिछले 100 वर्ष के राजनैतिक इतिहास के हर विषय पर बोले थे।

नेहरू ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के तहत,उन क्षेत्रों में मुस्लिम आरक्षण की मांग की थी जहां पर वे संख्या बल के हिसाब से अल्पसंख्यक थे। इस पर भी गोडसे ने आपत्ति न प्रकट कर, नेहरू नीति को मौन स्वीकृति दी।चलिए नेहरू पर मौन तो ठीक लेकिन इसका दोषी भी गांधी जी को बताना क्या दर्शाता है ??

1946 में जब डायरेक्ट एक्शन डे घोषित हुआ और कलकत्ता व नोआखली में हजारों हिंदुओं की हत्या कर दी गई। 30,000 हिन्दू लड़कियों का जिहादियों ने अगवा कर धर्म परिवर्तन करवा दिया। उस समय नेहरू व जिन्ना इंग्लैंड में बैठे रहे। आखिर क्यों नेहरू के निष्क्रिय आचरण पर गोडसे ने कुछ न कहा और बयानों में मौन रहा?

मौलाना आजाद जो 1940 से 1946 तक, 6 वर्ष जबरन बिना चुनाव के कांग्रेस के अध्यक्ष पद हथिया कर जमे रहे थे। नोआखाली के हिन्दू नरसंहार पर, कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना की चुप्पी पर भी गोडसे ने अपने बयान में रोष प्रकट न कर, उनके खल चरित्र को उजागर होने से बचाया। यह कैसी देश भक्ति थी हिन्दू गोडसे की ?

मक्का में पैदा हुए विदेशी माता पिता के पुत्र, घर बैठ कर शरिया पढ़े मौलाना आजाद ने अलीगढ़ में कुरान पाक का सहारा लेकर, मुस्लिम सभा को वैश्विक जिहाद के लिए भड़काया था। वे ख़िलाफ़त आंदोलन के नेता होने के नाते, टर्की के खलीफा के लिए समर्थन जुटा कर अलगाववाद का बीज बो रहे थे। नेहरू और मौलाना आजाद के गोडसे पर क्या उपकार थे या क्या दबाव था कि उसने इन दो नेताओं की छवि के चौकीदार के रूप में न्यायालय में लिखित बयान प्रस्तुत किया और कोई आंच न आने दी?

1946 में नोआखाली में स्थानीय प्रभावशाली हिन्दू समाज सेवियों के सहयोग से, जब गांधी जी अपहृत हिंदू लड़कियों को जिहादियों के घर से निकाल कर स्वतंत्र कराने का प्रयास कर रहे थे, उन पर, मुस्लिम लीग द्वारा पथराव किया गया, उनका रास्ता रोक कर उनको बंगाल छोड़ने के लिए नारे लगाए। अंततः गांधी जी को मुसलमानों द्वारा किये भारी विरोध के चलते बंगाल छोड़कर बिहार जाना पड़ा।

इस समय ना तो बंगाल के हिंदुओं की रक्षा के लिए नेहरू आगे आए, ना कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आजाद और ना वहां के मेयर फिर प्रधानमंत्री सुहरावर्दी ने ही कोई कदम उठाए। गोडसे ने अपने न्यायालय में दिए बयानों में नेहरू, जिन्ना, सुहरावर्दी या मौलाना आजाद के इस साम्प्रदायिक व्यवहार पर मौन रह कर उनकी छवि पर एक भी दाग नहीं पड़ने दिया और इसके विपरीत गांधी को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।

ऐसा कैसा देश भक्त था गोडसे?

अपने सैक्युलर व अलगाववादी बयानों से तो गोडसे, कट्टर कांग्रेसी सेक्युलर व नेहरू भक्त ज्यादा और देशभक्त कम प्रतीत होता था।

जवाहरलाल नेहरू के निजी सहायक एम ओ मथाई की पुस्तक के अनुसार मौलाना आजाद एक नंबर के झूठे व विदेशी महंगी मदिरा के प्रेमी व्यक्ति थे। जेल में भी मौलाना के लिए मदिरा का प्रबंध किया जाता था।

1947 में मौलाना ने नेहरू से एक ऐतिहासिक झूठ के तहत कहा कि गांधी जी ने दृढ़तापूर्वक उन्हें शिक्षा मंत्री का पद दिए जाने की संस्तुति की है। जबकि इस बात के आज भी प्रमाण मौजूद हैं कि महात्मा गांधी ने नेहरु को पत्र लिखकर कहा था कि मौलाना को शिक्षा मंत्री कतई नहीं बनाना चाहिए, नहीं तो वो शिक्षा बर्बाद कर देगा। फिर भी नेहरू ने यह पद मौलाना को ही दिया। गोडसे को नेहरू के इस कदम पर कोई आपत्ति ना थी कि मौलाना शिक्षा को अपने सहयोगियों के साथ मिलकर बर्बाद कर रहा था जिसका परिणाम झूठे इतिहास के रूप में हमारे समक्ष है ही।

उन दिनों अल्लामा इकबाल का एक वैश्विक जिहाद पर लिखा गीत तराना-ए-मिली प्रसिद्ध हुआ। गांधी जी ने अल्लामा इकबाल के चरित्र में हुए परिवर्तन को देख उसे व उसके शागिर्दों को 1932 में ही देशद्रोही घोषित कर दिया था। जबकि गोडसे ने अपने बयानों में अल्लामा इकबाल की राष्ट्र विरोधी कृतियों और जिहादी चरित्र पर उंगली न उठाकर, इक़बाल की छवि पर दाग न लगने दिया। आखिर क्यों, गोडसे यह सच बोलने से डरता रहा? आज इकबाल पाकिस्तान के राष्ट्रपिता की तरह जाना जाता है जिसे गांधी जी ने पहले ही समझ लिया था।

ये कैसा देशभक्त था गोडसे ?

अगस्त 1947 में, एक दूरदर्शी, उदार व विद्वान महाराजा हरि सिंह, जम्मू कश्मीर के भारत में विलय के लिए तैयार थे। परन्तु शेख अब्दुल्ला ने वहाँ पर कश्मीर षड़यंत्र आंदोलन चला रखा था। नेहरू व शेख अब्दुल्ला की घनिष्ठता के कारण, महाराजा हरि सिंह जम्मू कश्मीर को नेहरू सरकार के अधीन करने में हिचकिचा रहे थे। तभी मीरपुर में कबाइलियों का हिंदुओं पर हमला हुआ, हजारों हिन्दू मारे गए। हिन्दू स्त्रियों को अपहरण कर पाकिस्तान के वेश्यालयों में बेच दिया गया। यह वही शेख अब्दुल्ला था जिसने आगे चलजर श्यामाप्रसाद मुखर्जी को अकारण कारागार में डाल दिया था।

गांधी ने तो पाकिस्तान से युद्ध को ही समस्या का अंतिम व एक मात्र हल मान लिया था, जिसके सबूत भी है । परंतु नेहरू जी ने, 26 अक्टूबर, 1947 को महाराजा हरि सिंह पर दबाव बनाकर, इस शर्त पर, जम्मू कश्मीर का विलय कर, सेना की मदद पहुंचाई, जब वे शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री मानने को तैयार हो गए।

सेक्युलर चरित्र के गोडसे ने, अपने बयानों में, नेहरू के राष्ट्र की संप्रभुता पर घातक इस निर्णय पर विरोध का एक शब्द भी व्यक्त न कर, उसे मौन स्वीकृति दी, व नेहरू की छवि पर खरोंच तक न आने दी बल्कि इसके उलट उसने गांधी पर मनगढ़ंत आरोप लगाकर उन्हें ही उत्तरदायी ठहराया। ऐसा क्यों किया गोडसे ने ?

1932 में गांधी ने लार्ड इरविन के समक्ष जनहित में ग्यारह मांगे रखीं जिनमे से कुछ ऐसी है…

विदेशी मदिरा निषेध, नमक पर टैक्स हटाना, भूमि पर लगान में कटौती, उच्च अधिकारियों के वेतन में कटौती, स्टर्लिंग-रुपए के अनुपात में कटौती, मिलिट्री खर्चों में कटौती, CID भंग करने, विदेशी वस्त्रों पर टैक्स व अन्य साथ ही आत्मरक्षा हेतु हथियारों के लाइसेंस की अनुमति की भी मांग की लेकिन लॉर्ड इरविन से पहले तो नेहरू ने ही उक्त ग्यारह मांगों को पिछड़ेपन व अंधकार की तरफ जाने वाली कह कर गांधी का विरोध कर दिया और तभी से गांधी नेहरू के मध्य एक असंतुष्टि की लाइन खिंच गयी थी।

नेहरू ने आजाद भारत का पहला प्रधानमंत्री न बनाये जाने पर गांधी जी को कांग्रेस पार्टी के टुकड़े कर आजादी को लटकाने की धमकी का भी प्रयोग किया जिसके प्रत्यक्ष गवाह सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद व अन्य रहे ही।महात्मा गांधी तो दिसम्बर 1947 में नेहरू को प्रधानमंत्री पद से उतार कर सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के प्रयास में लगे थे। इस तथ्य को भी दबा दिया गया।

महात्मा गांधी ने कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों को देखते हुए व दंगों को रुकवाने में असफल नेहरू से क्षुब्ध होकर 1934 में ही कांग्रेस की चवन्नी की सदस्यता भी त्याग दी थी। फिर भी इतनी घृणा किस कारण से गोडसे में गांधी के प्रति कैसे पनपी, यह स्पष्ट नहीं।

29 जनवरी, 1948 को, गांधी जी ने देश भर से मिल रही शिकायतों के आधार पर,कांग्रेस को भंग कर एक नई पार्टी बनाये जाने का ड्राफ्ट लिखवा दिया था। परन्तु यह बात भी गोडसे ने न्यायालय के समक्ष बयानों में छिपाई थी। क्या इसलिए कि यह महत्वपूर्ण बात नेहरू के विरुद्ध थी और इससे नेहरू के प्रति जनता में विरोध का स्वर मुखरित होता?

30 जनवरी, 1948, शुक्रवार अर्थात जुम्मे के दिन, महात्मा गांधी से नाराज मौलाना आजाद उन से दोपहर में मिलने गए थे। गांधी जी ने उक्त ड्राफ्ट मंगवाकर तैयार रखा था जिसे वे जनता के समक्ष प्रस्तुत करते की अब कांग्रेस की जगह नई पार्टी की घोषणा की जानी चाहिए। परंतु दुर्भाग्यवश स्टेज की सीढ़ियों पर ही गांधी जी को गोडसे ने अपने बयान के अनुसार 2 गोलियां मार दीं।

यह बात आश्चर्यजनक है कि न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेज के अनुसार, गांधी जी को 3 में से एक गोली पीछे से मारी गई थी। हाल ही में प्रस्तुत एक सुने सुनाए सबूत को भी न्यायालय में प्रस्तुत किया गया कि एक ऐसे व्यक्ति का डॉ नेने द्वारा इलाज किया गया था जिसने गांधी जी को गोली मारने की बात गुप्त रूप से स्वीकार की थी। हालांकि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बात को सरकारी वकील ने दबाए रखा और इतने वर्ष बाद 2018 में भी पीछे से गोली मारने के तथ्य पर किसी ने कोई प्रश्न चिह्न खड़ा नहीं किया।

किन तथ्यों व सबूतों को छिपाने हेतु नेहरू ने गांधी जी का पोस्टमार्टम नहीं होने दिया? आम आदमी ऐसा करता तो उस पर मुकदमा चलता और वो जेल जाता।

गांधीजी की अंत्येष्टि के पश्चात बची हुई अस्थियों व राख में से गोलियां क्यों न निकाल कर सबूत के रूप में न्यायालय में प्रस्तुत की गईं ??

गोडसे के अनुसार उसके बयान मीडिया और कांग्रेस के दस्तावेजों के आधार पर तैयार किए गए थे जिनसे ऐसा लगता है कि गोडसे राष्ट्रभक्त कम और नेहरू भक्त ज्यादा था या मौलाना आजाद का प्यादा था या इक़बाल की आंखों का तारा था या अंग्रेजी प्रशासन का ऐसा मूर्ख समर्थक था जिसे नेहरू और मौलाना द्वारा योजनाबद्ध भड़काया गया था।

गोडसे ने अपने 150 पैरा के बयान में बहुत सारी ऐसी बातों का कहीं उल्लेख नहीं किया और न ही उसने कंही भी नेहरू का विरोध किया। इसके विपरीत गोडसे ने नेहरू व कांग्रेस के हर गलत निर्णय के लिए गांधी जी को ऐसे दोषी ठहराया जैसे कि इसी उद्देश्य के लिए पूरा बयान ही तैयार किया गया हो।

यह स्पष्ट है कि गोडसे का लिखित बयान का पूरा का पूरा झूठ का पुलिंदा व किसी अन्य के इशारे पर तैयार किया गया था जिसको कांग्रेस सरकार ने इतने साल तक सबसे छुपाए रखा ताकि कहीं पोल पट्टी ना खुल जाए।

खैर गांधी हत्या पर मेरा लेख हर प्रकार से नेहरू व मौलाना आजाद को दोषी मानने का दृष्टिकोण है व नेहरू के निर्णयों को दोषी ठहरा रहा है, नेहरू के चरित्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।

नाथूराम गोडसे को गांधी हत्या के लिए अपने झूठ व जेहाद से उकसाने वाला मौलाना आजाद था। यह बात गोपाल गोडसे ने जस्टिस जीवन लाल कपूर जांच आयोग को अपना बयान में बताई थी जो कि रिपोर्ट में दर्ज है।

किस तरह से सारे तथ्य छिपा दिए गए समझना पड़ेगा क्योंकि देश गांधी नेहरू गोडसे के चक्कर में मौलाना आजाद के फैलाए झूठ और जेहाद के जाल बुरी तरह फंसा हुआ है।

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