उम्र के साथ घटती हैं फेफड़ों की क्षमता, ब्रीदिंग एक्सरसाइज से करें फेफड़े मजबूत

स्वास्थ्य और सौन्दर्य

मेडिकल के पेशे को आप देखें तो यह उम्मीदें और प्रेरणा देने वाला क्षेत्र हैं। सुनने में अजीब लगेगा कि यह तो रोग-रोगियों से संबंधित क्षेत्र है, लेकिन हर दिन कोई न कोई तरक्की की खबर आती है और बीमारियों, दुश्वारियों का दायरा घटते जाता है। डॉक्टर और सर्जन प्राय: अपने पेशे में चमत्कार देखते हैं। कोई मरणासन्न व्यक्ति भला-चंगा होकर लौटे तो कितनी उम्मीद, खुशी और प्रेरणा चारों ओर छा जाती है। मानव जीवन कर्म प्रधान है और क्षेत्र शाश्वत संघर्ष का क्षेत्र होता है। शायद हमें उदार, परिपक्व, सहनशील और कर्मठ बनाने का प्रकृति का यही तरीका है। इसीलिए तो मेडिकल में कोई नई दवा, कोई नई पद्धति या टीका किसी बीमारी को काबू करता है तो पता चलता है कि कोई दूसरी समस्या पैदा हो गई।

पिछले कुछ वर्षों से भारत में फेफड़े या श्वसन रोगों का प्रकोप बढ़ गया है। अब जो दिन आने वाले हैं, कम तापमान और आर्द्रता के उनमें यह समस्या बढ़ जाती है। फेफड़े अथवा श्वसन संबंधी बीमारियां किसी रोगी को सघन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में भरती करने की आम वजह हो गई है। कभी-कभी तो फेफड़ें इतनी बुरी तरह से प्रभावित होते हैं कि वे अपनी पूरी क्षमता से, कारगर तरीके से काम ही नहीं कर पाते। नतीजा यह होता है कि खून में ऑक्सीजन की मात्रा खतरनाक हद तक नीचे चली जाती है या कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बहुत ऊंचा चला जाता है। माक्स के जरिये ऑक्सीजन की पूर्ति करने के बाद भी रोगी को आप सांस देने में संघर्ष करते पा सकते हैं। जब हालत ऐसी हो जाए तो दुनिया की ज्यादातर सघन चिकित्सा इकाइयों में रोगी को श्वसन की कृत्रिम मशीनों या वेंटीलेटर से जोड़ दिया जाता है। इसमें रोगी के ट्रेकिया यानी विंडपाइप में ट्यूब डाल दी जाती है अौर फिर पॉजिटिव प्रेशर वेंटीलेशन शुरू हो जाता है।

सांस लेना जीवन का आधार है इसके बावजूद हम फेफड़ों की हिफाजत के लिए सजग नहीं। हम लंग्स की वजह से सांस लेते हैं और ये सही तरीके से काम करते रहें इसके लिए कोई एफर्ट नहीं करते। कोरोना वायरस लंग्स डैमेज कर रहा है। ऐसे में डॉक्टर्स ब्रीदिंग एक्सरसाइज और प्राणायाम की सलाह दे रहे हैं। अगर अभी तक आपने इस पर ध्यान नहीं दिया है तो अब ब्रीदिंग एक्सरसाइज करके फेफड़ों को मजबूत बनाने की कोशिश कर सकते हैं। ब्रीदिंग एक्सरसाइज से सिर्फ फेफड़े मजबूत ही नहीं होते बल्कि स्ट्रेस भी कम होता है। कई तरीके वजन और फैट कम करने में भी कारगर होते हैं। यहां जानते हैं घर पर ब्रीदिंग एक्सरसाइज करने के आसान तरीके…

उम्र के साथ घटती हैं फेफड़ों की क्षमता

जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है, फेफड़ों की काम करने की क्षमता घटने लगती है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि 20 साल की उम्र से हमारे लंग्स की कैपेसिटी धीरे-धीरे कम होने लगती है। अगर आपको सांस से जुड़ी समस्याएं हैं जैसे क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज तो फेफड़ों की कार्य क्षमता और तेजी से घटती है। कोरोना वायरस लंग्स डैमेज कर रहा है और ऑक्सीजन कम होने पर कई लोगों की मौत की खबरें सामने आ रही हैं। ऐसे में घबराएं नहीं और सजग रहें। आप घर पर ही कुछ ब्रीदिंग एक्सर्साइज करना शुरू कर सकते हैं।

हालांकि, यदि फेफड़ों का गंभीर नुकसान हो गया हो तो कभी-कभी वेंटीलेटर्स से जुड़ने के बाद भी रोगी की हालत में सुधार नहीं आता। यह सही है कि वेंटीलेशन से जोड़ना बहुत स्थापित उपचार पद्धति है, लेकिन लंबी अवधि के वेंटीलेशन से भी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। खासतौर पर उन स्थितियों में जहां श्वसन के लिए बहुत लंबे समय तक बाहरी सपोर्ट की जरूरत होती है। रोगी को बिस्तर पर ही बने रहना पड़ता है। वह चल नहीं सकता, बोल नहीं सकता अौर अस्पताल की परिस्थितियों के कारण फेफड़े में संक्रमण का जोखिम बहुत अधिक होता है।

अब ऐसी स्थिति के लिए एक नई टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, जिसे ईसीएमओ या एक्स्ट्रा कॉर्पोरियल मैंम्ब्रेन ऑक्सीजनेशन कहते हैं। इसमें दो मुंह वाली एक नली को गर्दन में पाई जाने वाली जुगुलर वेन के जरिये सीधे एट्रियम यानी दिल के ऊपरी दो चैम्बर में से एक चैम्बर में डाली जाती है। इसे एक कृत्रिम फेफड़े या ऑक्सीजनेटर से जोड़ दिया जाता है। यह फेफड़े की तरह काम करना है और रक्त को दाएं एट्रियम में पहुंचाता है। इस तरह यदि रोगी के फेफड़े काम न भी कर रहे हों, ऑक्सीजन-कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान प्रभावित नहीं होता। रोगी को इसके जरिये कई महीनों तक सपोर्ट दिया जा सकता है। इससे रोगी के फेफड़ों को ठीक होने का समय मिल जाता है। वे घूम-फिर सकते हैं, सामान्य रूप से भोजन कर सकते हैं, बोल सकते हैं और व्यायाम तक कर सकते हैं। यदि उन्हें वेंटीलेटर से न जोड़ा गया हो तो अस्पताल में होने वाले संक्रमण का जोखिम कम हो जाता है। यदि फेफड़ों को ऐसा नुकसान पहुंचा हो, जिसे ठीक नहीं किया जा सकता तो प्रत्यारोपण भी किया जा सकता है। यह स्वाइन फ्लू या एच1 एन1 इन्फ्लूएंजा में वरदान साबित हो सकता है। यह टेक्नोलॉजी भारत में उपलब्ध है और इसकी लागत 2 से 3 लाख रुपए के बीच आती है, जो खतरे को देखते हुए बहुत अधिक नहीं है। आप शायद तकनीकी शब्दावली से ऊब गए होंगे, लेकिन मैंने यह ताज़ा उदाहरण इसलिए दिया कि हमारे देश में स्वाइन फ्लू का खतरा हर साल मंडराता है और आगे आने वाले दिन इसकी दृष्टि से सतर्कता के हैं। फिर उम्मीद और प्रेरणा की जो मैं बात कर रहा था, वह भी इस नए इनोवेशन से सिद्ध होती है।

पहला तरीका

किसी सपोर्ट के साथ सीधे बैठ जाएं या पीठ के बल लेट जाएं। एक हाथ छाती पर रखें और दूसरा पेट पर। नाक से सांस लें। सांस लेते वक्त ध्यान रखें कि आपका पेट बाहर की ओर आए और छाती वैसी ही रहे। सांस धीरे-धीरे 2 सेकेंड तक बाहर छोड़ें। इस दौराना आपका पेट अंदर की ओर जाना चाहिए। रिपीट करें।

दूसरा तरीका

ऊपर बताई गई पोजिशन में ही बैठें। नाक से धीरे-धीरे सांस लें। मुंह से धीरे-धीरे सांस बाहर निकालें। ध्यान रहे इस दौरान होंठ से पाउट बनाएं या सीटी बजाने की मुद्रा में हों। आपको सांस लेने में जितना वक्त लगा था, सांस छोड़ने में लगभग दोगुना वक्त लगाएं। रिपीट करें। दिन में 3 बार ऐसा कर सकते हैं।

अनुलोम विलोम

क्रॉस लेग पोजीशन में बैठ जाएं। बाएं नॉस्ट्रिल (नथुने) से सांस लें। इस दौरान दांए नॉस्ट्रिल को अंगूठे से बंद रखें। इस क्रिया को अनुलोम कहते हैं। अब दाएं नॉस्ट्रिल से सांस छोड़ें और बाएं को बंद रखें। इसको विलोम कहते हैं। अब फिर से दाएं नॉस्ट्रिल से सांस लें और प्रक्रिया जारी रखें। ध्यान रखें अंदर सांस लेने और छोड़ने का अनुपात 1:2 होगा।

ब्रीदिंग एक्सरसाइज के ये भी हैं फायदे

-ब्रीदिंग एक्सरसाइज करने से स्ट्रेस कम होता है

-आप रिलैक्स होते हैं

-एकाग्रता बढ़ती है

-एनर्जी लेवल बढ़ता है

-नींद अच्छी आती है

कम होता है बॉडी फैट

PubMed Central में छपी जापान की एक स्टडी के मुताबिक, जिन लोगों ने ‘Senobi’ ब्रीदिंग टेक्नीक को 1 महीने तक फॉलो किया उनका बॉडी फैट कम हुआ। इस प्रक्रिया में हाथ उठाकर गहरी सांस लेना होता है और ऐसा करते वक्त पीछे की ओर झुकना होता है।

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