ईको फ्रेंडली के चक्कर में पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं आप

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कहीं पर्यावरण को बचाने के चक्कर में हम उसे और नुकसान तो नहीं पहुंचा रहे? क्या ईको फ्रेंडली दिखने और कहे जाने वाला हर विकल्प वकाई में पूरी तरह ईको फ्रेंडली होता है या आधी तस्वीर देख कर ही हम फैसला कर लेते हैं?

दुनिया में ऐसी कई जगहें हैं जिन पर नष्ट हो जाने का खतरा मंडरा रहा है. इनके बारे में जागरूकता फैलाने के लिए कई लोग इनका रुख कर रहे हैं. वहीं कुछ को लग रहा है कि जितनी जल्दी हो सके इन्हें एक आखिरी बार देख लिया जाए, कल क्या पता मालदीव जैसी खूबसूरत जगह रहें या ना रहें. लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए वे जो फ्लाइट लेते हैं, उनसे इतना कार्बन उत्सर्जन होता है कि वही इन्हें इनके अंत के और करीब ले जा रही हैं.

साफ पानी का मोल
बढ़ती आबादी के साथ साथ जाहिर है कि साफ पानी की मांग भी बढ़ रही है. ऐसे में पानी को साफ करने वाले डिसैलिनेशन प्लांट भी बढ़ रहे हैं. यहां पानी से नमक और अन्य चीजों को अलग किया जाता है. लेकिन अगर इसका ठीक से निपटारा ना किया जाए तो ये पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा सकता है. बेहतर तकनीक के चलते ये प्लांट पहले के मुकाबले सुधरे जरूर हैं लेकिन पूरी तरह “ईको-फ्रेंडली” नहीं बने हैं

हर वक्त इंटरनेट
अगर आप यह भी तय कर लें कि कहीं नहीं जाएंगे, घर पर ही रहेंगे और इंटरनेट पर ही इन जगहों की तस्वीरें देख लेंगे या फिर नेटफ्लिक्स पर इनके बारे में कोई डॉक्यूमेंट्री देख लेंगे, तो भी आप पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं. डाटा भेजने और रिसीव करने में खूब ऊर्जा खर्च होती है. हाई स्पीड इंटरनेट के जमाने में जब करोड़ों लोग अपने स्मार्टफोन और स्मार्ट टीवी पर लगे हों, तो नुकसान कितना होगा, आप खुद ही सोच लीजिए.

ईको फ्रेंडली खाना
पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए अब बहुत लोग शाकाहारी और वीगन हो गए हैं. कई शाकाहारी चीजों को अब सुपरफूड के नाम से बेचा जाता है. लेकिन सुपरफूड की मांग पूरी करने के लिए पूरे के पूरे जंगल काटे जा रहे हैं. मिसाल के तौर पर आवोकाडो. मेक्सिको में इसके चलते जंगलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. दूध के विकल्प के रूप में इस्तेमाल होने वाले “आलमंड मिल्क” के लिए भी बादाम के खेती में टनों पानी बर्बाद हो रहा है.
इलेक्ट्रिक कारें
पिछले कुछ सालों से लगातार कहा जा रहा है कि सड़कों से प्रदूषण को कम करने का, कार्बन उत्सर्जन को घटाने का एकमात्र तरीका है ई-कारों का इस्तेमाल. पर क्या वाकई ये उतनी ईको फ्रेंडली हैं जितना हम सोचते हैं? इन्हें बनाने में और खास कर इनकी बैटरी पर जिस तरह से संसाधन खर्च होते हैं, उन्हें देखते हुए तो ऐसा नहीं लगता. इसके अलावा बैटरी के कूड़े का निपटारा करने का भी अब तक कोई ठोस तरीका नहीं मिला है.

ईको फ्रेंडली शॉपिंग
कम से कम पश्चिमी देशों में लोग पर्यावरण को ले कर अब इतने जागरूक हो गए हैं कि ज्यादा दाम दे कर ईको फ्रेंडली सामान खरीदने लगे हैं. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इतना सामन खरीदना जरूरी है? आप जो भी खरीदें, भले वो ईको फ्रेंडली हो या ना हो लेकिन संसाधन तो दोनों ही तरह के सामान में खर्च हो रहे हैं. तो क्यों ना खरीदारी की आदत पर ही लगाम लगाई जाए?

ठंडी हवा की कीमत
जलवायु परिवर्तन के चलते जैसे जैसे गर्मी बढ़ रही है एसी पर हमारी निर्भरता भी बढ़ती जा रही है. पर कितनी अजीब बात है कि गर्मी से राहत देने वाले एसी से ही इतनी गर्मी निकलती है कि ये जलवायु परिवर्तन को और बढ़ावा दे रहे हैं. क्या बिना बिजली का इस्तेमाल किए, बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए ठंडी हवा नहीं मिल सकती? वैज्ञानिक फिलहाल इसी सवाल में उलझे हुए हैं.

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